शरद पूर्णिमा
खिल उठी धरती के आँगन, में पूनम की चाँदनी
धवल रश्मियाँ मिल पवन सँग, गा रही हैं रागनी
अंक में भर लूँ धरा को, चूम लूँ मैं आसमाँ
पँख लेकर पंछियों सँग, देख लूँ सारा जहाँ
बाँसुरी की स्वर लहरियों, से ध्वनित वातावरण
शृंगार कर सरिता चली, सागर से मिलने को यहाँ
बह रही है मंद-मंद ये, प्रेममय मंदाकिनी
खिल उठी धरती के आँगन, में पूनम की चाँदनी |1|
मोतियों सम, तारकों सँग, झिलमिलाता है गगन
दीपकों की जगमगाती, ओढनी ओढे चमन
बादलों के विम्ब से है, झील का दर्शन मनोहर
अमिय का अभास देता, क्षीर का रस आस्वादन
दिव्य सुन्दरता लिये, मन मोहती ये यामिनि
खिल उठी धरती के आँगन, में पूनम की चाँदनी |2|
अभिसार करती छू पवन को, तरुवरों की डालियाँ
दूर से आते स्वरों से, गूँजती हैं घाटियाँ
चन्द्रिका के हार पहने, हिम रजत मणिमय मुकुट
यौवना सी हैं दमकती, पर्वतों की चोटियाँ
काँपती परछाईयाँ ज्यूँ नृत्य करती कामिनि
खिल उठी धरती के आँगन, में पूनम की चाँदनी |3|