प्रेमाश्रु



बन के यादों का झोंका, जब तू मन को छू जाती है

अश्कों की अविरल गंगा, मुझको पावन कर जाती है



खिले खिले प्यारे से चेहरे, पर है कितना भोलापन

हँसती है तो बच्चों सी, मुस्कान बिखेरे मन भावन

निश्छल प्यार भरी आँखें जब मुझे निहारे जाती हैं

अश्कों की .....................



अरसे से मौन हुए भावों को, तुमने आज जगाया है

बन प्रेम दीप मन मन्दिर में कृष्णा से हमें मिलाया है

होठों को छू कर बाँसुरिया, फ़िर से गीत सुनाती है

अश्कों की .....................



छोटी सी प्यारी से सोनू, बन के रहना पलको में

दूर् नहीं होना आँखों से, बह कर के इन अश्कों में

सूनी आँखो में जब जब तस्वीर तुम्हारी आती है

अश्कों की .....................