चल मन अपने गाँव में



परदेसी बन रहे बहुत दिन, चल मन अपने गाँव में



मधुर गान सुन गगनचरों का, ऊषाकाल में होती लाली

दिवस चमकता श्वेत रजत सम, स्वर्णिम आभा संध्या वाली

जहाँ चाँदनी कहे कहानी, लख तारों की छाँव में



परदेसी बन रहे बहुत दिन, चल मन अपने गाँव में



सावन में भीगी धरती से, भीनी खुशबू आती है

दूर कहीं बागों में कोयल, कूहू-कूहू गाती है

रज लेकर शिववाहन के चरणों की, अन्न उपजता है

वत्सलता से भरी शाम को, गाय माँ रम्भाती है

शुद्ध हवा पानी भर देते, शक्ति तन मन प्राण में



परदेसी बन रहे बहुत दिन, चल मन अपने गाँव में



कृत्रिमता से दूर जहाँ, मन में बसती निश्छलता है

प्रेम उमड़ता है दिल में, नयनों में भरी सजलता है

मेहनत और सादगी वाला, जीवन जीते लोग जहाँ

देख कष्ट में एक सभी का, हाथ सहारा बनता है

पलक जहाँ पे बिछ जाती हैं, अतिथि के सम्मान में



परदेसी बन रहे बहुत दिन, चल मन अपने गाँव में



दर्शन होते संस्कृति के, भिन्न-भिन्न त्योहारों में

जहाँ सभ्यता विकसित होती, शिक्षा और संस्कारों में

मंदिर में परिलक्षित होते, श्रद्धा और विश्वास जहाँ

भक्तिमय संगीत गूँजता, कूचों और गलियारों में

जहाँ ईश दर्शन होते, गुरु मात पिता के पाँव में



परदेसी बन रहे बहुत दिन, चल मन अपने गाँव में