मेरे पास
पास नहीं है कुछ भी मेरे, पर मत कहना प्यार नहीं है
उपहार प्रेम का देने को, मैं चंद पुष्प चुनने निकला
बगिया में जाकर देखा वहाँ, पतझर है बहार नहीं है
फूल नहीं थे पास तो क्या, सोचा शब्दों का हार पिरो दूँ
पर मेरे शब्दों की माला में, पीड़ा है शृंगार नहीं है
पास नहीं है कुछ भी मेरे, पर मत कहना प्यार नहीं है
तट पर देखा इक बार तुम्हे, कई बार पुकारा दी आवाज़
सागर और तूफ़ाँ की गर्जन, में दबकर रह गये अल्फ़ाज़
तूफ़ाँ से तो लड़ लेते पर, कैसे लगे किनारे नैया
बीच भँवर मेरी नैया में, माँझी है पतवार नहीं है
पास नहीं है कुछ भी मेरे, पर मत कहना प्यार नहीं है