|| मधुशाला के प्रति ||

हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं

माना की शब्द सुरीले हैं, और अलंकार की भाषा है
पर, मदिरा के मद में डूबी, मादकता की परिभाषा है
विष भरे कनक घट से जैसे, मिलती अमृत की धार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||1||

मदिरा और मदिरालय के, गुण गाने वाली मधुशाला
ना जाने क्या सोच कवि ने, महिमा मंडित कर डाला
मदिरा और मदिरालय में, मर्यादा का व्यवहार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||2||

जिस मदिरा ने ना जाने, कितने परिवारों को तोड़ा
लम्पट और शराबी लूटें, लाज कहीं का ना छोड़ा
मदिरालय के गुण लिखती, क्यों रुकी कलम की धार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||3||

है वो भी एक बहन किसी की, जिसको कहते हो साकी
अरे ! शर्म से डूब मरो, यदि लाज अल्प भी है बाकी
मातृवत्त दृष्टा होते तो, लज्ज्ति होती नार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||4||

क्या कभी देखी, शर्म नज़र में, मदिरा पीने वालों की
आतुर जो, बेबस साकी का, हाथ पकड़ने वालों की
हाथ न पकड़ा कहते जीवन, व्यर्थ गया साकार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||5||

ना जाने किस कारण बेबस, वितरित करने को हाला
कामी को बस यौवन दिखता, दिखता अधरों का प्याला
फिर भी, मदिरा महिमा गाने में , क्यों सोचा एक बार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||6||

जब पापी राजाओं के, गुण गाये चारण भाटों ने
भर दिए खजाने दुष्टों के, उन बुद्धिहीन सम्राटों ने
पुरस्कार की नहीं पात्र, जिस कविता में संस्कार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||7||

रो ते बच्चे, रो ती ललना, बेबस और मूक पिता माता
पर मदिरा के व्यसनी को, रत्ती भर तरस नहीं आता
क्यों नहीं सुनाई पड़ती परिवारों की हाहाकार नहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||8||

अंतिम पद में भी तुमने, यदि इक उपदेश दिया होता
राह भटकते युवा पथिक को, इक सन्देश दिया होता
जो मदिरा के कारण टूटा, बस जाता परिवार कहीं
हे कविवर नमन तुम्हें मेरा, पर ये कविता स्वीकार नहीं ||9||