कवि नहीं कविता हूँ मैं
कवि नहीं कविता हूँ मैं
धरती - आकाश - तलातल की, एकमेव प्रभुता हूँ मैं
कवि नहीं कविता हूँ मैं
मैं हँसकर पुष्पित कर दूँ, क्षण में इस वसुधा तल को
चाहूँ अगले पल भड़का दूँ, हिमशिखरों पर दावानल को
या बन करके कालकूट, तान्डव दिखला सकता हूँ मैं
कवि नहीं कविता हूँ मैं
निश्छल ममता का मृदु स्पर्श, पाकर विस्मृत हों भवबन्धन
क्षणोपरान्त करे आह्लादित, मन को उच्छृंखल यौवन
नेत्रहीन को भी जीवन - दर्पण, दिखला सकता हूँ मैं
कवि नहीं कविता हूँ मैं
मृग तृष्णा में क्यों भटके हो, ऐ भोले मृगशावक तुम
कस्तूरी हो लिये नाभि में, क्यों इसको भूले हो तुम
बन कर दीपक तुम्हे उषाकाल की, लाली दिखलाता हूँ मैं
कवि नहीं कविता हूँ मैं