अन्तिम प्रणाम
श्रध्दा और सबूरी की भी, अपनी सीमा होती है
हर सजदे में तुम्हे माँगते, हार गयी तक़दीरें भी
हे प्रियवर! हे दिव्य आत्मा! ले लो अब अन्तिम परनाम
टूट रहीं अब धीरे धीरे, साँसों की जन्ज़ीरें भी
इतने बन्धन पास इतना, होकर भी ना कुछ कह पाये
जी भरना तो दूर रहा, एक पल भी देख नहीं पाये
फ़िर दूर अकेले में जाकर, सपनों में बातें होती थी
बेबस सी आँखों से फ़िर, यादों की गंगा बहती थी
हर पल, हर दम बन्द आँखों से जिन्हे निहारा करते थे
धुँधली पड़ गयी अब तो तेरी, यादों की तस्वीरें भी
श्रध्दा और सबूरी की भी, अपनी सीमा होती है
हर सजदे में तुम्हे माँगते, हार गयी तक़दीरें भी
ना जीने की चाहत है, ना इन्तज़ार है मरने का
ना शेष रहा कोई सपना, बोझिल आँखों में भरने का
एक बार! बस एक बार! मेरा नाम जुबाँ से ले लेना
झूठे मन से ही हाथ हिला, तुम मुझे विदाई दे देना
सपनों को सच करने की, असफ़ल कोशिश करते करते
घुट घुट के दम तोड़ चुकी, हाथों में बन्द लकीरें भी
श्रध्दा और सबूरी की भी, अपनी सीमा होती है
हर सजदे में तुम्हे माँगते, हार गयी तक़दीरें भी